सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक बेहद संवेदनशील मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने कहा कि पिछले 12 वर्षों से मरणासन्न अवस्था में पड़े 31 वर्षीय युवक को इस हालत में यूं नहीं छोड़ा जा सकता।
यह टिप्पणी जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने की। पीठ युवक के पिता द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई कर रही है, जिसमें इलाज रोकने और जीवन रक्षक सपोर्ट हटाकर युवक को प्राकृतिक रूप से मरने देने की अनुमति मांगी गई है।
सुनवाई के दौरान अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) द्वारा प्रस्तुत की गई मेडिकल रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट ने बेहद दुखद बताया। रिपोर्ट के अनुसार युवक पिछले 12 वर्षों से ऐसी अवस्था में है, जहां उसके ठीक होने की कोई संभावना नहीं दिख रही है।
शीर्ष अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा कि इस तरह के मामलों में मानवीय संवेदनाओं, नैतिक मूल्यों और कानून के संतुलन पर विचार करना जरूरी है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जीवन और मृत्यु से जुड़े ऐसे मामलों में जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लिया जा सकता।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर आगे की सुनवाई कर रहा है और AIIMS की रिपोर्ट सहित सभी पहलुओं पर गहन विचार किया जा रहा है।


